होम्योपैथी में 'शक्तिकरण' का रहस्य: 'शक्ति-क्रम' और 'शक्ति-मात्रा' में अंतर | ThinkHomeo
जानिए होम्योपैथिक औषधियों के 'शक्तिकरण' (Potentization) की वैज्ञानिक विधि को समझें। जानें कि कैसे 'शक्ति-क्रम' (Attenuation) और 'शक्ति-मात्रा' (Potency) एक-दूसरे से भिन्न हैं, और इसका आयुर्वेद के रस-विज्ञान से क्या संबंध है। जानने हेतु पूरा पढ़ें- होम्योपैथिक औषधियों के शक्तिकरण (Potentization), शक्ति-क्रम (Attenuation) और शक्ति-मात्रा (Potency) में क्या अंतर है – सोचें, समझें, और सीखें। पूरा लेख पढ़ें!
होम्योपैथिक औषधियों का 'शक्तिकरण': 'शक्ति-क्रम' और 'शक्ति-मात्रा' में क्या है अंतर?
भारत में प्राचीन-काल से आयुर्वेद में रस-विज्ञान Alchemy / Metallurgical Science (रस-विज्ञान एक प्राचीन भारतीय रसायन विज्ञान है जो धातुओं और रसायनों से संबंधित है।) एक शास्त्र चला आ रहा है। इस विज्ञान के अनुसार भिन्न-भिन्न विषों की, धातुओं की भस्में तैयार की जाती हैं। इन भस्मों को तैयार करने की एक विधि है जिसके अनुसार शत-पुटी भस्म (Shat-puti Bhasma) - 100-times fired ash, सहस्र-पुटी भस्म (Sahasra-puti Bhasma) - 1000-times fired ash तैयार होती है। आयुर्वेद के तरीके के अनुसार लोहा, पारा आदि धातुओं को मिट्टी के बर्तनों में ढाँक कर सौ बार, हजार बार कण्डों की आग में रखने से उन धातुओं की भस्म बनाई जाती है जो शक्ति-सम्पन्न कही जाती है। शत-पुटी, सहस्र-पुटी भस्म के अतिरिक्त कई विषों को भिन्न-भिन्न औषधियों के रसों में एक महीना या दो महीना रगड़ा जाता है जिससे भावना देना कहा जाता है। इससे भी इससे औषधि की मात्रा कम हो जाती है, किन्तु उसकी शक्ति बढ़ जाती है।
इन दोनों पद्धतियों का आधारभूत सिद्धांत यही प्रतीत होता है कि आग को पुट देने या घर्षण-मर्दन (Friction-Trituration) द्वारा किसी औषधि को रस की भावना देने से उसकी मात्रा कम हो जाती है, उसके कण-कण अलग हो जाते हैं, और ये परमाणु रूप कण शरीर के तन्तुओं पर स्थूल औषधि को अपेक्षा अधिक गहरा प्रभाव डालते हैं। ठीक इस तरह की तो नहीं परन्तु लगभग कुछ ऐसी-सी पद्धति का आविष्कार हनीमैन ने होम्योपैथिक औषधियों की स्थूल मात्रा कम करने किन्तु उनकी शक्ति बढ़ा देने- शक्तिकरण- के विषय में किया था जो निम्न प्रकार है।
होम्योपैथिक औषधियों का निर्माण: विचूर्ण और मदर-टिंचर
औषधियों की मात्रा कम करने और ‘मर्दन’ अथवा ‘आलोड़न (Succussion)’ द्वारा शक्ति बढ़ाने के लिये उन्हें पहले दो रूपों में लाया जाता है। कड़ी चीजों को -लोहा, सोना आदि को ‘विचूर्ण (Crude Drug)’ रूप में लाते हैं, उनका चूरा कर लेते हैं, किन्तु जड़ी बूटियों का रस निचोड़ कर उनका ‘पूर्ण-घोल (Saturated Solution)’ तैयार कर लेते हैं। ‘विचूर्ण’ को अंग्रेजी में Crude Drug कहते हैं, ‘पूर्ण-घोल’ (Saturated solution) को अरिष्ट या अंग्रेजी में (Mother Tincture) कहते हैं। जब औषधि का रस अल्कोहल में जितना घुल सकता है उससे ज्यादा नहीं घुल सकता तब उसे ‘पूर्ण-घोल’ (Saturated Solution या Mother Tincture) कहते हैं। होम्योपैथिक औषधियों की मात्राएँ, उनकी शक्तियां इन्हीं विषर्णों तथा पूर्ण घोलों से बनाई जाती हैं। पूर्ण-घोल को मदर-टिंचर इसलिए कहते हैं क्योंकि इससे आगे औषधि की जो शक्ति बनती है उस सब की माँ यही मदर-टिंचर होता है। ‘विचूर्ण’ तथा ‘पूर्ण-घोल’ उनके भीतर छिपी शक्ति को मर्दन तथा आलोड़न से प्रकाश में ले आना ही ‘शक्ति-करण’ (Potentization) कहलाता है।
'शक्ति-क्रम' (Attenuation) और 'शक्ति-मात्रा' (Potency) में भेद
विचूर्ण (Crude Drug) तथा पूर्ण-घोल (Mother Tincture) से होम्योपैथिक औषधियों का शक्ति-क्रम (Attenuation) दो प्रकार का होता है।
एक ‘शक्ति-क्रम’ तो 3x, 6x, 30x, 200x आदि कहलाता है- यह ‘दाशमिक-क्रम’ (Decimal Attenuation) कहलाता है।
दूसरा ‘शक्ति-क्रम’ 1C, 2C, 3C, 6C, 30C, 200C, 1000C आदि कहलाता है- यह ‘शत-क्रम’ (Centesimal attenuation) कहलाता है।
'शक्ति-क्रम' और 'शक्ति-मात्रा' में भेद है। 3x, 6x, 30x, या 1C, 2C, 3C आदि तो शक्ति के क्रम हैं, और सिर्फ 3x, कहा जाय या 6x, इतना ही कहा जाय, या 1C इतना ही कहा जाय, तो वह ‘शक्ति-क्रम’ (Attenuation) नहीं है, यह ‘शक्ति-मात्रा’ (Potency) है। शक्ति-क्रम के अन्दर शक्ति-मात्रा आ जाती है, शक्ति तो क्रम का एक हिस्सा है। ‘शक्ति-क्रम’ तो औषधि की श्रृंखला (Series of potency) का नाम है, जो श्रृंखला एक-एक ‘शक्ति-मात्रा’ के जोड़ों से बनती है।
✅ निष्कर्ष (Conclusion)
- आयुर्वेद हो या होम्योपैथी, दोनों में यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से सामने आता है कि —
“औषधि की मात्रा घटाएं, पर उसकी शक्ति बढ़ाएं।” - होम्योपैथिक सिस्टम में यह कार्य विज्ञानसम्मत तरीके से,
विचूर्ण, मदर टिंचर, मर्दन, और आलोड़न के माध्यम से होता है। - शक्ति-करण, शक्ति-क्रम और शक्ति-मात्रा — तीनों को समझना,
किसी भी होम्योपैथ को दवाई की सटीकता और इलाज के प्रभाव को पहचानने में मदद करता है।
🔁 होम्योपैथी का पहला सिद्धांत - 'समः समं शमयति'