Digitalis Purpurea (Foxglove) – डिजिटेलिस पर्पुरिया
Digitalis (डिजिटेलिस) होम्योपैथी में हृदय की अत्यन्त धीमी धड़कन (Slow pulse / Bradycardia), हृदय रोग के कारण होने वाले पीलिया (Jaundice) और सांस फूलने (Dyspnea) की अचूक दवा है। जानें इसके लक्षण।
Digitalis Purpurea (डिजिटेलिस) होम्योपैथी में मुख्य रूप से हृदय (Heart) और रक्त-संचार प्रणाली (Circulatory System) पर बहुत गहरा प्रभाव डालने वाली औषधि है। यह हृदय की मांसपेशियों और उसकी गति (Pulse rate) को नियंत्रित करने की एक बहुत बड़ी दवा मानी जाती है।
व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग (Generals and Particulars)
- मन्द नाड़ी: नाड़ी (Pulse) का अत्यन्त मन्द (Slow) पड़ जाना।
- अनियमित नाड़ी: तीसरा, पांचवा, सातवां स्पन्दन (Beat) छोड़कर नाड़ी का चलना।
- पेट में कमजोरी: मन्द-नाड़ी के साथ पेट में कलेजा बैठने का-सा (Sinking sensation) अनुभव होना।
- मानसिक प्रभाव: शोकातुरता (Grief / Sorrow) के कारण हृदय का धड़कना।
- हृदय और लिवर: हृदय रोग के कारण पीलिया (Jaundice) की बीमारी में इसका प्रयोग।
- श्वास रोग: हृदय रोग के कारण श्वास में कठिनाई (Cardiac Dyspnea) की बीमारी में डिजिटेलिस का प्रयोग।
- नींद में परेशानी: हृदय की मन्द-गति के कारण सोते हुए श्वास रुक-सा जाना (Suffocative spells during sleep)।
विस्तृत विवरण (Detailed Description)
1. नाड़ी का अत्यन्त मन्द पड़ जाना (Extremely Slow Pulse / Bradycardia)
- हृदय एक मांस-पेशी (Muscle) है। इसके दो काम हैं।
एक काम है—रुधिर (Blood) को जो शरीर में चक्कर काट कर और फेफड़ों से शुद्ध होकर हृदय की तरफ आ रहा है उसे लेना;
दूसरा काम है—रुधिर को शरीर के पोषण के लिये धमनियों (Arteries) द्वारा शरीर को देना।
- इस दोहरे काम के लिये हृदय गति कर रहा है। यह गति हृदय के उक्त दोनों कामों को दृष्टि में रखते हुए दो तरह की होती है। जब हृदय सिकुड़ता है तब इसमें से रुधिर धमनी में चला जाता है; जब यह फैलता है तब फेफड़ों द्वारा शुद्ध किया हुआ रुधिर फेफड़ों से हृदय में आ जाता है। हृदय के सिकुड़ने को 'सिस्टोल' (Systole) कहते हैं, 'सिस्टोल-गति' द्वारा हृदय से रुधिर बाहर धमनियों द्वारा शरीर में पहुँचने के लिये जाता है; हृदय के फैलने को 'डायस्टोल' (Diastole) कहते हैं, 'डायस्टोल' गति से फेफड़ों में शुद्ध हुआ रुधिर हृदय में आ इकट्ठा होता है।
ऐलोपैथी बनाम होम्योपैथी (Allopathy vs Homeopathy):
ऐलोपैथिक मत के अनुसार डिजिटेलिस का प्रभाव हृदय के 'संकोचन' (Systole) तथा 'विमोचन' (Diastole) की गति को बल देकर हृदय की मांस-पेशी को बल देना है। उनके मत से डिजिटेलिस हृदय को टोन (Tone) देता है—हृदय का टौनिक (Tonic) है।
होम्योपैथिक मत के अनुसार टौनिक नाम की कोई चीज नहीं है। संपूर्ण शरीर को जो वस्तु स्वस्थ कर दे वही टौनिक है, और प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की रचना पर भिन्न-भिन्न औषधियों का भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है। किसी व्यक्ति की 'धातुगत औषधि' (Constitutional drug) Phosphorus हो सकती है, किसी की Sulphur, किसी की Calcarea Carb। जिस व्यक्ति की जो 'धातुगत औषधि' होगी उसके लिये वही टौनिक होगी, दूसरी औषधि नहीं।
डिजिटेलिस का मुख्य लक्षण:
- डिजिटेलिस का मुख्य लक्षण 'अत्यन्त धीमी नाड़ी' (Extremely slow pulse) का होना है। कभी-कभी नाड़ी 48 स्पन्दन (Beats per minute) तक चली जाती है। अत्यन्त धीमी का यह अर्थ नहीं है कि जिस समय चिकित्सक रोगी का निरीक्षण कर रहा है उसी समय नाड़ी अत्यन्त धीमी हो। इस समय (जांच के वक्त) नाड़ी बिजली की तरह तेज भी हो सकती है, परन्तु रोग की 'प्रारंभिक अवस्था' में नाड़ी की क्या हालत थी, यह जानना आवश्यक है।
- डिजिटेलिस के रोगी की नाड़ी शुरू-शुरू में, जब वह बीमार पड़ा, अत्यन्त मन्द हो जाती है। अगर रोगी इस समय बेचैन है, घबराया हुआ है, उसे भयंकर स्वप्न आते हैं, नाड़ी छूटती-सी अनुभव होती है, तब तो इसका यह अर्थ है कि रोग बहुत आगे बढ़ चुका है। परन्तु इस अवस्था में भी डॉ. कैन्ट (Dr. Kent) के अनुसार डिजिटेलिस देने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि 'रोगी की शुरू में क्या हालत थी?'
- क्या उसकी नाड़ी शुरू में 48 या इसके आस-पास चल रही थी? अगर ऐसा है, तो यह रोगी Digitalis का रोगी है, परन्तु अगर शुरू में नाड़ी तेज थी, तब यह रोगी इस दवा का नहीं—ऐसा समझना चाहिये। इस औषधि की नाड़ी शुरू में ही मन्द होती है, और कई दिन तक मन्द रहती है, अन्त में 'प्रतिक्रिया' (Reaction) के रूप में हृदय अनियमित चाल (Irregular rhythm) से चलने लगता है।
- ऐलोपैथ लोग डिजिटेलिस तब देते हैं जब नाड़ी बहुत तेज चलने लगे ताकि उसे धीमा किया जा सके;
- होम्योपैथ डिजिटेलिस तब देते हैं जब 'नाड़ी अत्यन्त मन्द गति से चल रही हो'।
- ऐलोपैथी में इस औषधि के कुछ बूंद अत्यन्त तेज गति से चल रहे हृदय को शान्त करने के लिये दिये जाते हैं,
- होम्योपैथी में जब 'हृदय की अत्यन्त मन्द गति हो' तब इसका प्रयोग किया जाता है। अगर हृदय की तीव्र गति है, तब भी इसके प्रयोग के लिये यह जान लेना आवश्यक है कि शुरू-शुरू में हृदय की अत्यन्त मन्द गति थी या नहीं? इसीलिये हमने कहा कि इसका मुख्य लक्षण नाड़ी का अत्यन्त धीमा होना है।
2. तीसरा, पांचवा, सातवां स्पन्दन छोड़कर नाड़ी का चलना (Intermittent Pulse)
- जब नाड़ी धीमी चलती है, तब तो इस औषधि का क्षेत्र है ही, परन्तु जब कभी तेज - कभी धीमी चले, तब बीच-बीच में अनियमित (Irregular) चलने लगती है—तीसरा, पांचवां, सातवां स्पन्दन छोड़ देती है (Drops 3rd, 5th, or 7th beat)। इस अनियमित-स्पन्दन की हालत में भी औषधि को स्मरण रखना चाहिये।
3. मन्द-नाड़ी के साथ पेट में कलेजा बैठने का-सा अनुभव (Sinking Sensation in Stomach)
- इस रोगी की नाड़ी की गति इतनी मन्द पड़ जाती है कि कभी-कभी 40 स्पन्दन तक चली जाती है। रोगी को पेट (Stomach) में कलेजा बैठने का-सा अनुभव (Sinking feeling / Faintness) होता है। ऐसा अनुभव होता है कि बस अब गये, तब गये (As if life is leaving)। 'खाने से भी पेट में आराम नहीं मिला'।
- बेचैनी, बेहोशी-सी (Faintness), असमर्थता, अत्यन्त क्षीणता (Extreme prostration), बलहीनता का अनुभव पेट तथा तल-पेट (Abdomen) में होता है।
4. शोकातुरता के कारण हृदय का धड़कना (Palpitation from Grief)
- किसी शोक (Grief/Sorrow) का रोगी के हृदय पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि हृदय धक्-धक् करने लगता है (Palpitation)। रोगी अनुभव करता है कि हृदय की गति समाप्त हो गई है, हृदय ठहर गया है (Heart has stopped), हृदय में फड़फड़ाहट (Fluttering) होती है। जरा-से भी परिश्रम (Slightest exertion) से हृदय पर जोर पड़ता अनुभव होता है।
- हरकत (Motion) से हृदय की धड़कन और घबराहट बढ़ जाती है। रोगी की नाड़ी 40 तक पहुंच जाती है, और अगर वह करवट भी बदलता है (Turning in bed) तो नाड़ी फड़फड़ाने लगती है, उसकी गति तेज हो जाती है, सारे शरीर में नाड़ी की थिरकन (Pulsation) अनुभव होने लगती है।
5. हृदय-रोग के कारण पीलिया की बीमारी में डिजिटेलिस का प्रयोग (Jaundice due to Heart Disease)
- पीलिया रोग (Jaundice) के दो कारण हो सकते हैं: एक तो जिगर की (Hepatic) तथा दूसरी हृदय की (Cardiac) बीमारी।
- जब हृदय रोग के कारण मतली (Nausea) और कय (Vomiting) होने लगे, रोगी का सारा शरीर पीला (Yellow) पड़ने लगे, आंख की श्वेतिमा सोने जैसे रंग के समान पीली पड़ जाय, नाखून तक पीले हो जायें, मल रंग रहित (Ash/White stool) हो जाय, मूत्र बीयर के रंग का-सा (Dark brown urine) हो जाय, नाड़ी की गति अत्यन्त मन्द पड़ जाय (40-30 तक चली जाय), तब समझ लेना चाहिये कि रोग हृदय की मन्द-गति के कारण है, और तब Digitalis लाभप्रद होगा।
6. हृदय रोग के कारण श्वास में कठिनाई की बीमारी में डिजिटेलिस (Cardiac Dyspnea)
- हृदय की कमजोरी के कारण रोगी चलते-फिरते, ऊंचाई पर चढ़ते समय (Ascending) हाँफने लगता है, सांस लेने में तकलीफ (Dyspnea) होती है।
डॉ. नैश का अनुभव:
डॉ. नैश एक ऐसे रोगी का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि एक दिन एक हट्टा-कट्टा, तगड़ा आदमी सड़क पार कर इनके आफिस की तरफ आ रहा था। वह चलते हुए डगमगा (Staggering) रहा था। उन्होंने समझा कि वह शराब पिये हुए है, परन्तु निकट से देखने पर पता चला कि उसका चेहरा, होंठ नीले (Blue/Cyanotic) पड़ गये थे।
उसे सहारा देकर इन्होंने कमरे के अन्दर ला बिठाया। कुछ मिनट तक तो बेचारा बैठा हांफता रहा, उसके मुंह से आवाज तक नहीं निकली। उसकी नाड़ी बड़ी अनियमित चल रही थी, बीच-बीच में एक स्पन्दन गायब हो जाता था (Dropped beats)। कुछ देर दम लेने के बाद वह कहने लगा कि कई बार उसे इस प्रकार की श्वास की कठिनाई हो जाती है, वह चलते-चलते रास्ते में दम लेने के लिये बैठ जाता है।
डॉ. नैश ने उसकी नाड़ी की मन्द गति को देखकर Digitalis 2 शक्ति की कुछ बूंदें पानी में डालकर पिलाईं। कुछ दिन बाद क्या देखते हैं कि वह फावड़ा लेकर अपने घर के सामने की बर्फ साफ कर रहा था। डॉक्टर नैश को देखकर कहने लगा: "उस दवा को लेने के बाद से उसके सांस के दौर खत्म हो गये और हृदय की जो बीमारी थी वह भी जाती रही।"
7. हृदय की मन्द गति के कारण सोते हुए श्वास रुक जाने की कठिनाई (Suffocative Spells during Sleep)
- हृदय की बीमारी में सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। रोगी हर समय गहरा सांस लेने (Deep breath) का प्रयत्न करता है।
- जब वह सोने लगता है (As soon as he falls asleep) तब उसे ऐसा प्रतीत होता है कि सांस रुक गया (Breathing stops)। वह गहरा सांस भर कर उठ बैठता है (Starts up from sleep gasping for breath)। Lachesis, Phosphorus और Carbo Veg में भी ऐसा लक्षण है।
- रोगी स्वप्न में देखता है कि वह नीचे गिर रहा है (Falling from a height)। निद्रा के समय मस्तिष्क में रक्त का संचार कम होता है, और अगर हृदय कमजोर हो, नाड़ी मन्द हो, तो सिर में पर्याप्त रुधिर न पहुंचने के कारण रोगी सोते से चौंक उठता है, भयानक स्वप्न (Frightful dreams) आते हैं, अंगों का स्फुरण (Twitching of limbs) होता है। जागते हुए भी शरीर में बिजली का शौक (Electric shock-like sensation) लगता-सा अनुभव होता है, बेहोशी आती है, कमजोरी हो जाती है।
8. इस औषधि के अन्य लक्षण (Other Symptoms)
i. हरकत का भय: रोगी इतना दुर्बल होता है कि जरा-सा भी हिलने-डोलने (Slightest motion) से ऐसा लगता है कि हृदय की क्रिया बन्द हो जायगी। (इसके विपरीत Gelsemium का रोगी अगर हिले-डुले नहीं, तो उसे लगता है कि हृदय की क्रिया बन्द हो जायगी)।
ii. प्रोस्टेट ग्रंथि: डॉ. कैन्ट (Dr. Kent) कहते हैं कि प्रोस्टेट ग्लैंड (Prostate gland enlargement) की यह अमूल्य औषधि है। उनका कहना है कि अगर डिजिटेलिस का उन्हें ज्ञान न होता, तो वे नहीं जानते कि प्रोस्टेट के रोगियों का इलाज वे कैसे कर सकते (विशेषकर जब साथ में हृदय रोग हो)।
iii. खांसी: हृदय की दुर्बलता के कारण होने वाली खांसी (Cardiac cough) में यह औषधि उपयोगी है।
iv. शोथ (सूजन): हृदय-रोग के कारण पांव आदि की शोथ (Edema/Dropsy) में भी यह लाभप्रद है।
v. स्वप्नदोष: डिजिटेलीन (Digitalin) स्वप्नदोष (Nocturnal emissions / Seminal emissions) की एक बहुत बढ़िया दवा है। 'डिजिटेलीन' डिजिटेलिस का ही एक क्षार (Alkaloid) है।
9. शक्ति (Potency)
- इस औषधि का प्रयोग मूल अर्क (Mother Tincture / Q), 3, 30, 200 शक्ति में किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: Digitalis का हृदय पर सबसे मुख्य (Keynote) लक्षण क्या है?
उत्तर: इसका सबसे प्रमुख लक्षण यह है कि रोगी की नाड़ी (Pulse) बहुत ही 'मन्द' (Slow - 40 से 50 धड़कन प्रति मिनट) हो जाती है। कभी-कभी नाड़ी बीच-बीच में अपनी धड़कन छोड़ देती है (Intermittent pulse)।
प्रश्न 2: Gelsemium और Digitalis के हृदय रोगी में क्या अंतर है?
उत्तर: Digitalis के रोगी को लगता है कि अगर वह 'थोड़ा भी हिलेगा या करवट लेगा' तो उसका दिल धड़कना बंद कर देगा। इसके ठीक विपरीत, Gelsemium के रोगी को लगता है कि अगर वह 'हिलना-डुलना बंद कर देगा', तो उसका दिल धड़कना बंद कर देगा।
प्रश्न 3: क्या यह पीलिया (Jaundice) में भी काम आती है?
उत्तर: जी हाँ, यदि किसी को लिवर की बीमारी की बजाय 'हृदय की मन्द गति' के कारण पीलिया हुआ हो, जिसमें सफेद रंग का मल आए, पेशाब भूरा हो और पूरा शरीर पीला पड़ जाए, तो यह दवा अचूक काम करती है।
प्रश्न 4: सोते समय अचानक सांस रुक जाने (Sleep Apnea / Suffocative spells) में इसका क्या रोल है?
उत्तर: जब हृदय बहुत कमजोर होता है, तो रोगी जैसे ही सोने लगता है, उसे लगता है कि उसकी सांस रुक गई है और वह तड़प कर गहरी सांस लेते हुए उठ बैठता है। इस स्थिति में Digitalis (Lachesis की तरह) जीवन रक्षक साबित होती है।
यह सामग्री सिर्फ शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और से पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।