Conium Maculatum (Hemlock) – कोनायम मैक्युलेटम

संशोधित: 15 May 2026 ThinkHomeo

कोनायम मैक्युलेटम चक्कर आना, जकड़न, प्रोस्टेट, लकवा और ग्रंथियों का कड़ापन एवं सूजन की स्थितियों के लिए उपयोगी है। यह लकवा और ग्रंथियों की सूजन में फायदेमंद है।

Conium Maculatum (Hemlock) – कोनायम मैक्युलेटम

Conium Maculatum (कोनायम), होम्योपैथी में मुख्य रूप से स्नायु-मंडल (Nervous System) के पक्षाघात, ग्रन्थियों (Glands) के कड़ेपन, और विशेष प्रकार के चक्कर (Vertigo) के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधि है।

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग (Generals and Particulars)

  1. पक्षाघात (Paralysis): पैर की तरफ से पक्षाघात का ऊपर की तरफ चढ़ना (Ascending paralysis) / मस्तिष्क में सुन्नपन।
  2. चक्कर (Vertigo): किसी भी तरफ सिर फेरने (Turning head) से चक्कर आ जाना।
  3. यौन समस्या: कामोत्तेजना न होना (Impotence / Lack of sexual desire)।
  4. फोटोफोबिया (Photophobia): नेत्र-रोग न होने पर भी रोशनी को न सह सकना।
  5. पसीना (Sweat): सोते हुए पसीना आना (Sweats as soon as one sleeps), जागते ही पसीना रुक जाना।
  6. ग्रन्थियों का कड़ापन (Induration of glands): स्तन (Breasts) आदि किसी ग्रन्थि का कड़ा पड़ जाना (जैसे कैंसर, ट्यूमर)।
  7. मूत्र विकार: पेशाब रुक-रुक कर आना (Intermittent flow of urine) - प्रोस्टेट-ग्लैंड (Prostate gland) के रोग के कारण ऐसा होना।
  8. खांसी (Cough): रात को श्वास-नलिका के एक खास स्थान से खांसी उठना।
  9. मानसिक/हिस्टीरिया: गले में गोले की तरह के एक पदार्थ का उठना (Globus hystericus)।

प्रकृति (Modalities) - लक्षण कम या ज्यादा होना

लक्षणों में कमी (Better / Amelioration):

  • उपवास (Fasting) से अच्छा लगना।
  • अन्धकार (Darkness) में अच्छा लगना।
  • हाथ-पैर दबाने (Pressure) से आराम।
  • हाथ-पैर लटकाने (Letting limbs hang down) से आराम।

लक्षणों में वृद्धि (Worse / Aggravation):

  • सर्दी (Cold) से रोग बढ़ना।
  • जबर्दस्ती के संयम (Suppressed sexual desire / Celibacy) से वृद्धि।
  • विषय-विलास (Sexual excess) से वृद्धि।
  • वृद्धावस्था के रोग (Ailments of old age)।
  • चलायमान वस्तु (Moving objects) को देखने से रोग में वृद्धि।
  • सिर को दायें या बायें फेरने (Turning head right or left) से रोगी को चक्कर आ जाना।

विस्तृत विवरण (Detailed Description)

1. पैर की तरफ से पक्षाघात का ऊपर की तरफ चढ़ना (मस्तिष्क में सुन्नपन - Ascending Paralysis)

  • कोनायम वह विष (Poison - Hemlock) है जिसका प्याला ग्रीस के दार्शनिक सुकरात (Socrates) को मृत्यु-दंड देने पर पीने के लिये दिया गया था। सुकरात ने जब इस विष को पिया, तो पहले उसके पांव सुन्न हो गये, धीरे-धीरे यह सुन्नपन पक्षाघात (Paralysis) के रूप में परिणत हो गया। ज्यों-ज्यों विष का असर होता गया त्यों-त्यों उसका शरीर नीचे से ऊपर सुन्न होता गया। इस अर्से में उसकी बुद्धि (Mind) ठीक काम करती रही।
  • पक्षाघात की दिशा: इस औषधि में पक्षाघात 'नीचे से ऊपर की तरफ' (Ascending) जाता है। पहले नीचे के अंग (Legs) काम करना छोड़ देते हैं, फिर क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर पक्षाघात बढ़ता चला जाता है। इसमें मस्तिष्क में सुन्नपन (Numbness in brain) पाया जाता है।

2. किसी भी तरफ सिर फेरने से चक्कर का आना (Vertigo on turning the head)

  • इसका प्रमुख लक्षण 'सिर चकराना' (Vertigo) है, ऐसा चक्कर जो 'इधर या उधर सिर फेरने से' फौरन आ जाता है। (Colocynthis का चक्कर तो सिर को बायीं तरफ फेरने से आता है), परन्तु इस औषधि का चक्कर 'सीधे मुंह' (Looking straight) आगे की तरफ चलने से तो नहीं आता, परन्तु 'इधर-या-उधर सिर फेरने' से आ जाता है।
  • लेटे-लेटे चक्कर: बिस्तर में लेटे-लेटे भी अगर दायें पलटें या बायें पलटें (Turning in bed), तब चक्कर आ जाता है। कई रोगी कह देते हैं कि बिस्तर में 'लेटने से' चक्कर आ जाता है परन्तु असल में, उनका अभिप्राय होता है कि जब बिस्तर में लेटे होते हैं तब पासा पलटने से—चाहे दायें पलटें चाहे बायें पलटें—चक्कर आ जाता है। 
  • वृद्ध लोगों (Old people) के चक्कर में भी यह उपयोगी है। 
  • किसी भी रोग में यह लक्षण पाया जाए, तो Conium से लाभ होता है।

मोतियाबिंद और चक्कर (Cataract and Vertigo):

  • डॉ. टेलबोट ने अपने लेख 'कोनायम एण्ड कैटरेक्ट' में एक स्त्री का जिक्र किया है जिसे डॉक्टर ने मोतियाबिन्द (Cataract) घोषित किया था और कहा था कि दो मास में आंख ऑपरेशन के योग्य हो जायेगी। वह तभी एक होम्योपैथ का इलाज कराने लगी। कैटरेक्ट के साथ उसका 'मुख्य लक्षण' यह था कि एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर ध्यान ले जाते समय जब वह सिर फेरती थी, तो उसे 'चक्कर आ जाता था'। शरीर में थकान और कमजोरी रहती थी। लक्षण Conium के थे, सो Conium 3 शक्ति की प्रतिदिन चार मात्राएं लेने को दी गईं। एक सप्ताह के बाद उसने कहा कि अंगों की कमजोरी तो बिल्कुल हट गई है, साथ ही आंख में भी फर्क है, अब आँख को एक वस्तु से दूसरी पर ले जाते हुए सिर 'कम' चकराता है। दस सप्ताह तक यह इलाज जारी रखने के बाद उसका मोतियाबिन्द दूर हो गया। कहने का अभिप्राय यह है कि कोनायम के 'सिर चकराने' के लक्षण पर 'चक्कर ही' नहीं ठीक हो गया, 'आंख का रोग भी' जाता रहा।

लोकोमोटर एटैक्सिया (Locomotor Ataxia):

  • इसी प्रकार का एक उदाहरण डॉ. नैश ने दिया है। उनके पास एक रोगी आया जिसे हाथ-पैर की पेशियों की कमजोरी (Locomotor ataxia - संतुलन खो देना) थी। वह सीधे मुंह चल सकता था, इधर-उधर देखता तो उसे चक्कर आ जाता था। वह अपनी स्त्री को आगे-आगे चलने को कहता था ताकि उसकी सीध में वह चलता जाय, और उसे इधर-उधर न देखना पड़े। उसे चार सप्ताह के भीतर समय-समय पर Conium दिया जाता रहा, और साल भर में उसका लोकोमोटर एटैक्सिया ठीक हो गया। इस औषधि के देने का निर्देशक लक्षण 'किसी तरफ़ भी सिर फेरने से चक्कर आ जाना' ही था।

3. कामोत्तेजना न होना (Impotence and Ailments from Celibacy)

  • इस औषधि का शरीर की 'ग्रन्थियों' (Glands) पर विशेष प्रभाव है। जननेन्द्रिय (Genitals) का भी क्योंकि अण्डकोशों (Testicles) से सम्बन्ध है, इसलिये इसका जननेन्द्रिय पर प्रभाव असंदिग्ध (निश्चित) है। इसके अतिरिक्त हम यह देख ही चुके हैं कि इसका 'पक्षाघात' (Paralysis) से भी सम्बन्ध है। स्नायु (Nerves) का सुन्न हो जाना, उसका दुर्बल हो जाना, अन्त में पक्षाघात में परिणत हो जाता है।
  • इस दुर्बलता का अण्डकोशों की ग्रन्थियों पर प्रभाव पड़ने के कारण रोगी में जननेन्द्रिय की दुर्बलता (Impotence) पायी जाती है। यद्यपि रोगी का चित्त चंचल होता है, काम-लालसा प्रबल (Strong desire) होती है, तो भी जननांगों की शिथिलता के कारण वह लालसा को पूर्ण नहीं कर सकता (Powerless)। स्त्री का ध्यान करते ही उसका वीर्य स्खलित हो जाता है (Premature ejaculation), उत्तेजना अपर्याप्त होती है, कुछ देर ही रहती है। अपनी असमर्थता को देखकर रोगी दुःखित हुआ करता है। इससे उसका चित्त खिन्न (Depressed) रहता है। उसे कुछ अच्छा नहीं लगता, वह चुप बैठा रहता है। हस्त-मैथुन (Masturbation) की उसे लत पड़ जाती है।
  • जबर्दस्ती किये संयम का बुरा फल (Ill effects of suppressed sexual desire): कभी-कभी पुरुष या स्त्री मन में से काम (Desire) की जड़ उखाड़ देने के स्थान में मन में तो कामचार के विचार को पकड़े रहते हैं, परन्तु जबर्दस्ती 'संयम' (Celibacy) का व्रत ले बैठते हैं।
  • कई विधुर (Widowers) तथा विधवाओं (Widows) को जिन्हें सहवास का अभ्यास पड़ गया है, परिस्थितिवश संयम करना पड़ता है। 'शुद्ध-संयम' से आत्म-शान्ति होनी चाहिये, परन्तु 'जबर्दस्ती' या परिस्थितिवश अपने को बांध लेने से मनुष्य का स्वभाव चिड़चिड़ा (Irritable) हो जाता है, सुस्ती, कार्य में अनिच्छा तथा नपुंसकता आ जाती है। इस अवस्था को Conium दूर कर देता है और व्यक्ति स्वस्थ-मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगता है। अगर उक्त लक्षणों में 'सिर का चक्कर' भी साथ हो, तब तो इस औषधि के निर्वाचन में कोई सन्देह नहीं रहता।

4. नेत्र-रोग न होने पर भी रोशनी को न सह सकना (Photophobia without inflammation)

  • जो लोग कृत्रिम-प्रकाश (Artificial light) में, बिजली की रोशनी में पढ़ा करते हैं, उन्हें नेत्र के किसी रोग (सूजन या लाली) के न होने पर भी दिन की रोशनी में कष्ट प्रतीत होता है (Intense photophobia)। रात को आँख में दर्द होने लगता है, आँख के दबाने (Pressure) से आराम मिलता है। अन्धेरे कमरे में अच्छा लगता है।
  • प्रायः विद्यार्थी रात को कृत्रिम-प्रकाश में पढ़ा करते हैं, उन्हें ऐसी तकलीफ हो जाया करती है। इस कष्ट को यह औषधि दूर कर देती है। 
  • डॉ. ऐलन इसी कारण इसे 'विद्यार्थियों की औषधि' (Students' remedy) का नाम देते थे।

5. सोते हुए पसीना आना, जागते ही पसीना रुक जाना (Sweats as soon as one sleeps)

  • इसका एक विलक्षण-लक्षण (Peculiar symptom) यह है कि रोगी को आँख मीचते ही पसीना (Sweat) आने लगता है। सोया नहीं कि पसीना आना शुरू हुआ, और आंख खुलते ही पसीना बन्द हो जाता है। यह लक्षण अन्य किसी दवा में नहीं पाया जाता।
  • डॉ. लिप्पे (Dr. Lippe) ने एक 80 वर्ष के वृद्ध को एक पासे के पक्षाघात (Hemiplegia) की बीमारी में इसी लक्षण के आधार पर ठीक कर दिया था। कई दर्द भी इस लक्षण से दूर हुए हैं। ज्वर (Fever) में भी यह औषधि गुण करती है।
  • इसके विरुद्ध 'जागते ही पसीना आना शुरू हो जाना' Sambucus का लक्षण है।

6. स्तन आदि किसी ग्रन्थि का कड़ा पड़ जाना - जैसे कैंसर, ट्यूमर (Induration of Glands)

  • इस औषधि का ग्रन्थियों (Glands) पर विशेष प्रभाव है, इसलिये अगर शरीर में कोई ग्रन्थि सूज जाए, कड़ी (Hard) पड़ जाए, तो इस औषधि की तरफ ध्यान जाना चाहिये।

स्तनों का कड़ापन: 

  • इसका स्त्री के 'स्तनों' (Breasts) के कड़ा होने पर विशेष प्रभाव है, स्तनों के कड़ेपन को यह दूर कर देती है। 
  • अगर हर बार रजःस्राव (Menses) के समय दाहिना स्तन सूज जाए, कड़ा पड़ जाए, उसमें दर्द हो, तो Conium लाभप्रद है। (बायां स्तन सूज जाए, तो Silicea उपयोगी है)। 
  • स्तन के कैंसर (Breast cancer) और ट्यूमर (Tumor) को भी इससे लाभ होता है।

कैंसर और ट्यूमर (Cancer and Tumor): 

  • स्तन के अतिरिक्त, जरायु (Uterus) या पेट (Stomach) के कैंसर या ट्यूमर में भी इस औषधि को भुलाया नहीं जा सकता। कभी-कभी 'चोट लग जाने के कारण' (Injury/Blow) स्तन, जरायु या पेट का कैंसर या ट्यूमर हो जाता है। ये स्थान 'पत्थर की तरह कड़े' (Stony hard) पड़ जाते हैं, दर्द भी होता है। शरीर के किसी भाग की ग्रन्थि का पत्थर की तरह कड़ा पड़ जाना इसका लक्षण है।
  • डॉ. ड्यूई (Dr. Dewey) के अनुसार ट्यूमर आदि में Conium 30 देना लाभकर है। स्तन ग्रन्थि शोथ में इसके बाद Psorinum अच्छा काम करता है।

7. पेशाब रुक-रुक कर आना - प्रोस्टेट ग्लैंड (Intermittent flow of urine)

  • यह रोग भी ग्रन्थि (Gland) से संबंध रखता है। प्रोस्टेट ग्रन्थि (Prostate gland) के बढ़ जाने से (Enlarged prostate) वृद्ध पुरुषों को पेशाब रुक-रुक कर आता है। आते-आते रुक जाता है, फिर आने लगता है।
  • अगर प्रोस्टेट ग्लैंड के कारण न भी हो, परन्तु अगर मूत्र करने में 'रुक-रुक कर आने' (Intermittent flow) का लक्षण हो, तो Conium देना चाहिये।
  • पेशाब रुक-रुक कर आने में Clematis Erecta के विषय में भी विवरण  हैं। क्लैमेटिस में 'सुजाक / Gonorrhea' के कारण मूत्र नली बन्द हो जाती है, उसका 'संकोचन' (Stricture) हो जाता है जिसे क्लैमेटिस दूर करता है।

8. रात को श्वास-नलिका के एक खास स्थान से खांसी उठना (Night Cough)

  • इस औषधि में दिन को खांसी नहीं आती, रात को (Nightly) खांसी उठती है, वह भी श्वास नलिका (Larynx) के ऊपर के एक खास स्थान पर लगातार 'खराश' (Dry spot / Tickling) होने लगती है, उसी से खांसी प्रारंभ होती है। बूढ़ों को यह बहुत परेशान करती है। श्लेष्मा (Mucus) बाहर निकलता नहीं, अन्दर ही निगल जाना पड़ता है।
  • लेटे रहने पर खांसी: रात में लेटने से (Lying down) खांसी होती है, रोगी को उठ जाना पड़ता है।

Hyoscyamus,Conium, Hepar Sulph, Belladonna, Lachesis में तुलना: 

  • Hyoscyamus में भी रात को लेटने से खांसी शुरू हो जाती है और रोगी उठ बैठता है, परन्तु हायोसाइमस में 'काक-जिव्हा' (Uvula - कौआ) के बढ़ जाने और लेटने पर उसके 'तालु' को छूने से खराश पैदा होने से खांसी शुरू होती है, Conium में यह बात नहीं है। 
  • Hepar Sulph में भी खांसी है परन्तु वह कभी खुश्क (Dry) नहीं होती, कफ ढीला होता है, कम होता है, हल्का बुखार भी हो जाता है। 
  • Belladonna की खांसी में श्वास नलिका में दर्द होता है, साथ में बुखार होता है। 
  • Lachesis में श्वास-नलिका पर 'जरा-सा भी दबाव' पड़े तो खांसी उठने लगती है क्योंकि यह औषधि स्पर्श को बर्दाश्त नहीं कर सकती। लैकेसिस का रोगी गले में गुलबन्द नहीं लपेट सकता, टाई तक नहीं बांध सकता क्योंकि इससे उसका गला रुंधने लगता है।

9. गले में गोले की तरह के एक पदार्थ का उठना (Globus Hystericus)

  • हिस्टीरियाग्रस्त (Hysterical) स्त्रियों में, अपने रोग की परेशानी से, गोले की तरह का एक पदार्थ (Lump) पेट में से उठकर गले में आकर अटकता है (Globus hystericus)। रोगिणी उसे निगलने की कोशिश कर नीचे उतारने का यत्न करती है, वह उतरकर फिर ऊपर आ उठता है।

 यह गोला उठना इस औषधि के अतिरिक्त Ignatia, Asafetida और Valeriana में भी पाया जाता है।

  • जब किसी स्त्री को अपने शरीर की ग्रन्थियों का कड़ापन देखकर मायूसी होने लगती है, स्वास्थ्य की दृष्टि से भविष्य अन्धकारमय दीखने लगता है (विशेषकर कैंसर/ट्यूमर के भय से), तब इस प्रकार का गोला उठा करता है। स्त्री रोना चाहती है पर रोने को रोकने का प्रयत्न करती है, तब जैसे 'रोने को रोकने पर' गला अवरुद्ध-सा हो जाता है, वैसा अनुभव इस गोले के गले में आकर अटकने तथा उसे निगलने का होता है। कोनायम में इसका मुख्य-कारण रोगी की अपने रोग के विषय में चिन्ता और निराशा है।
  • Ignatia में इस गोले के पेट से ऊपर चढ़ने का कारण कोई 'दुःख' (Grief), घर के किसी प्रिय की मृत्यु, प्रेमी का बिछोह आदि होता है। 
  • Asafetida में यह गोला 'पेट के अफारे' (Gas/Bloating) का परिणाम होता है। 
  • सख्त सिर दर्द और सामान्य कारण से मूर्छा होने के साथ गोला उठे, तो Valeriana लाभ करता है।

10. शक्ति तथा प्रकृति (Potency and Nature)

  • शक्ति (Potency): 6, 30, 200।
  • प्रकृति: औषधि 'सर्द' (Chilly) प्रकृति के लिये है (रोगी को ठंड लगती है)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: Conium (कोनायम) के चक्कर (Vertigo) की सबसे बड़ी पहचान क्या है? 

उत्तर: इसका सबसे प्रमुख लक्षण यह है कि रोगी को बिस्तर पर लेटे हुए करवट बदलने (पासा पलटने) या किसी भी तरफ 'सिर फेरने' से अचानक चक्कर आ जाता है। सीधे देखने या सीधे चलने पर उसे चक्कर नहीं आता।

प्रश्न 2: शरीर की गांठों (Tumors/Glands) में यह दवा कब काम आती है? 

उत्तर: जब शरीर की कोई भी ग्रन्थि (विशेषकर महिलाओं के स्तन या पुरुषों में प्रोस्टेट) सूजकर 'पत्थर की तरह कड़ी' (Stony hard) हो जाए, और विशेष रूप से यदि यह कड़ापन किसी पुरानी 'चोट' (Injury) लगने के कारण हुआ हो, तब कोनायम बहुत प्रभावी होती है।

प्रश्न 3: क्या यह दवा मानसिक और यौन समस्याओं में भी दी जाती है? 

उत्तर: जी हाँ। जिन लोगों को परिस्थितिवश या जबरदस्ती यौन संयम (Suppressed sexual desire / Celibacy) रखना पड़ता है (जैसे विधवा या विधुर), और उसके कारण उनमें चिड़चिड़ापन, मानसिक अवसाद, या नपुंसकता (Impotence) आ जाती है, उनके लिए यह एक बेहतरीन दवा है।

प्रश्न 4: वृद्ध पुरुषों में पेशाब की समस्या में इसका क्या उपयोग है? 

उत्तर: प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate gland) के कड़े हो जाने या बढ़ जाने के कारण यदि वृद्धों में पेशाब 'रुक-रुक कर' (Intermittent flow) आता है (यानी पेशाब आते-आते रुक जाए और फिर आने लगे), तो यह दवा उस रुकावट को दूर कर बहुत लाभ पहुंचाती है।

प्रश्न 5: इस दवा का पसीने (Sweat) से जुड़ा सबसे विचित्र लक्षण क्या है? 

उत्तर: इसका सबसे अनोखा लक्षण यह है कि रोगी के 'आंख बंद करते ही या सोते ही' पसीना आना शुरू हो जाता है, और जैसे ही वह जागता है या आंख खोलता है, पसीना तुरंत रुक जाता है।
 

यह सामग्री सिर्फ शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और से पेशेवर चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

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