Kali Bichromicum – कैलि बाइक्रोमिकम

संशोधित: 19 February 2026 ThinkHomeo

कैलि बाइक्रोमिकम साइनसिसिस, गाढ़े नाक के स्राव, रेशेदार बलगम, साइनस, शियाटिका और गठिया की अचूक दवा है। जानें इसके 'दर्द का स्थान बदलना' और 'एक बिंदु पर दर्द' जैसे विचित्र लक्षण और उपयोग।

Kali Bichromicum – कैलि बाइक्रोमिकम

Kali Bichromicum, जिसे संक्षेप में Kali Bich भी कहा जाता है, होम्योपैथी में श्लैष्मिक-झिल्ली (Mucous Membrane), जोड़ों और पेट के रोगों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गहरी क्रिया करने वाली औषधि है।

व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग (GENERALS AND PARTICULARS)

  1. चिपचिपा बलगम: किसी भी श्लैष्मिक-झिल्ली से चिपचिपा, पीला, लसदार बलगम निकलना जो खींचने से डोरे की तरह लम्बा खिंच जाए।
  2. गोल छेद वाले जख्म: जीभ, मुंह तथा गले में आतशक (Syphilis) के जख्म; ऐसे गहरे जख्म जैसे पंच (Punch) करके छेद किया गया हो।
  3. दर्द की प्रकृति: छोटे-से स्थान में दर्द होना (Pain in small spots); भिन्न स्थानों में दर्द का जल्दी-जल्दी स्थान परिवर्तन करना (Wandering pain); तथा दर्द का एकदम आना, एकदम जाना। सिर-दर्द से पहले देख न सकना (Blurred vision before headache)।
  4. पर्याय-क्रम (Alternating symptoms): गठिया और पेचिश (Dysentery), या गठिया और पेट की बीमारी का बारी-बारी से आना।
  5. शियाटिका: रोगी के शीत-प्रधान (Chilly) होते हुए भी शियाटिका के दर्द का गर्मी से बढ़ना।
  6. पित्त-पथरी (Gallstone): पित्त-पथरी बनने की प्रकृति को रोक देना।
  7. प्रकृति और समय: शीत-प्रधान रोगी तथा स्थूल-काय (Fat/Stout) प्रकृति; प्रातः 2 से 3 बजे रोग में वृद्धि; खाने के बाद परेशानी।

प्रकृति (Modalities) - लक्षण कम या ज्यादा होना

लक्षणों में कमी (Better):

  • गर्मी (Heat) से रोग में आराम (परन्तु शियाटिका में गर्मी से रोग में वृद्धि)।
  • हरकत (Motion) से रोग में आराम।

लक्षणों में वृद्धि (Worse):

  • ठंड या नमी (Cold or Dampness) से रोग बढ़ना।
  • प्रायः प्रातः 2 से 3 बजे रोग बढ़ना।
  • भोजन के बाद रोग बढ़ना।
  • बीयर (Beer) पीने से रोग बढ़ना।
  • शियाटिका के दर्द का गर्म सेक से बढ़ना।

 

1. श्लैष्मिक-झिल्ली (Mucous Membrane) से चिपचिपा, पीला, लसदार स्राव जो खींचने से डोरे की तरह लम्बा खिंच जाय-

  • इस औषधि का मुख्य-लक्षण (Keynote) यह है कि नाक, मुख, गला, श्वास प्रणालिका (Windpipe), फेफड़ा, अंतड़ियां, मूत्राशय, जननेन्द्रिय, जरायु—कोई भी अंग हो, उसकी श्लैष्मिक-झिल्ली से चिपचिपा, लसदार स्राव निकलता है, जो खींचने से डोरे की तरह लम्बा खिंच जाता है (Stringy/Ropy discharge)।
  • जुकाम में: अगर जुकाम हो तो नाक से ऐसा स्राव बहता है जो चिपचिपा, लसदार और डोरे के समान लम्बा निकलता है, अंगुलियों में चिपट जाता है।
  • अन्य अंग: मुख-गले, श्वास प्रणालिका से ऐसा ही जमा हुआ डोरे की तरह लम्बा लटकने वाला कफ़ निकलता है। आंतों से आंव (Mucus), मूत्राशय से, जननेन्द्रिय से ऐसा ही स्राव निकलता है। स्त्री के जरायु से प्रदर (Leucorrhoea) का भी ऐसा ही तारदार स्राव होता है।
  • नियम: किसी भी अंग से जब ऐसा सूत-सरीखा, चिपचिपा स्राव निकले, तो इस औषधि से लाभ होना ही चाहिए। (तुलना: किसी भी अंग से लम्बे सूत का-सा काला स्राव निकले तो Crocus Sativus दवा है)।

जुकाम में नाक की श्लैष्मिक-झिल्ली से स्राव: 

  • नये या पुराने जुकाम में जब बहुत अधिक मात्रा में सफेद या पीला, चिपकने वाला, गोंद-सरीखा स्राव निकले; नाक में सूखेपन का भान हो; रात को नाक गाढ़े पीले स्राव से भर जाने के कारण बन्द हो जाए; स्राव इतना चिपकने वाला हो कि निकाले न निकले, वहीं चिपट जाए। इसके साथ नाक की जड़ (Root of nose) में दर्द हो, तब इससे लाभ होता है।
  • पपड़ी (Crusts): इस गाढ़े, पीले स्राव के कारण नाक के भीतर पपड़ी जम जाती है, उसे निकालने के लिए रोगी बार-बार नाक सिनकता है। इस पपड़ी के टुकड़े नाक को भरे रहते हैं। जोर-जोर से सिनकने के बाद हरे रंग के टुकड़े (Clinkers) जो नाक के ऊपरी भाग में जमे होते हैं वे कठिनाई से निकलते हैं। कभी-कभी वे ऊपर से ही मुख के अन्दर सरक जाते हैं (Post Nasal Drip)।
  • जख्म: नाक के अन्दर दर्द महसूस होता है, नाक में जख्म हो जाते हैं, नाक के दोनों हिस्सों के बीच के पर्दे (Septum) पर जख्म हो जाते हैं। रोगी नाक को कुरेदता रहता है, नाक में से खून निकलने लगता है।

जुकाम के लिए मुख्य औषधियां (Comparison):

(शुरू-शुरू में):

  • Aconite: शुरू-शुरू में सर्दी लगने पर जब गले में खुश्की-सी हो, कुछ छींकें आयें और जुकाम शुरू होने वाला हो, तब दिया जाता है।
  • Camphor: जब शुरू में Aconite देने से लाभ न हो तब इसके मूल-अर्क की कुछ बूंदें दें।
  • Gelsemium: सर्दी लग कर जुकाम होने के साथ-साथ बुखार हो जाए, थरथराती ठंड लगे, शरीर में दर्द हो, बुखार के साथ प्यास बिल्कुल न हो।

(पनीले जुकाम में):

  • Allium Cepa: नाक तथा आंख से पनीला स्राव, जो आंख में तो न लगे परन्तु नकुरों और होठों पर लगे (Acrid nasal discharge), खुली हवा में आराम हो।
  • Euphrasia: अगर पनीला-स्राव आंख में तो लगे (Acrid tears), नाक में न लगे (Bland nasal discharge)।
  • Arsenicum Album: पनीला-स्राव जो नकुरों और होठों पर लगे परन्तु खुली हवा में कष्ट बढ़े और गर्म कमरे में आराम मिले।
  • Arsenic Iodide: Allium Cepa के लक्षण हों, साथ में इतना पानी बहे कि रुमाल-पर-रुमाल तर होते जाएं।
  •  Nux Vomica: यदि जुकाम छींकों (Sneezing) से शुरू हो; स्राव पनीला (Watery) हो; नकुरों (Nostrils) और होठों (Lips) पर लगे (अर्थात जलन पैदा करे/Acrid); दिन को नाक बहे (Fluent during day), परन्तु रात को बन्द (Blocked) हो जाए; रोगी शीत-प्रकृति (Chilly constitution) का हो परन्तु जुकाम में खुली हवा (Open air) पसन्द करे, तब इससे लाभ होता है।
  • Natrum Mur: पनीला या गाढ़ा या गाढ़ा-पतला मिला हुआ स्राव, नकुरों पर लगने वाला स्राव बहे, रोगी को खुली हवा पसन्द हो, तब इससे लाभ होगा।

(गाढ़े जुकाम में):

  • Kali Bichromicum: पुराना जुकाम जब गाढ़ा हो जाए, डोरी की तरह श्लेष्मा निकले, तारदार हो। 
  • Pulsatilla: गाढ़ा, बिना लगने वाला (Bland) पीला स्राव, रोगी को खुली हवा पसन्द होती है। 
  • Hydrastis: गाढ़े जुकाम में लाभप्रद है, विशेषकर जब गले में रेशा गिरता हो।
  • Merc Sol: गाढ़ा, लगने वाला स्राव, माथे में दर्द; जब रात में तकलीफ बढ़े।

(नाक बन्द हो जाने वाले जुकाम में - In Stuffy Cold):

  • स्टिक्टा (Sticta): नाक बन्द (Blocked nose) हो, बार-बार सिनकना (Blowing the nose) पड़े, पर श्लेष्मा (Mucus) न निकले।
  • नक्स वोमिका (Nux Vomica): यदि दिन या रात को नाक बन्द रहे, तब इससे लाभ होता है।

किसी भी श्लैष्मिक-झिल्ली से जैली की तरह का स्राव (Jelly-like discharge from any Mucous Membrane):

  • ऊपर जिस प्रकार के स्राव (Discharge) का जिक्र किया गया है, उसके अतिरिक्त शरीर की किसी भी श्लैष्मिक-झिल्ली से 'जैली की तरह' (Jelly-like) स्राव के निकलने पर भी इस औषधि (संभवतः Kali Bichromicum) से लाभ होता है। ऐसा स्राव नाक से, मुंह के भीतर तालु (Palate) से, गुदा-प्रदेश (Anus) से, स्त्री की योनि (Vagina) से—कहीं से भी निकल सकता है। 

श्लेष्मा का जैली जैसा स्राव और पीलापन: 

  • श्रीमती टायलर ने इस औषधि के लिए तीन शब्दों का प्रयोग किया है—Stringiness (सूतपना), Spottiness (स्वल्पस्थानपना - छोटे स्थान में दर्द), Yellowness (पीलापन)। 
  • इसमें श्लेष्मा का ही पीलापन नहीं है, आंख पीली हो जाती है, थूक पीला आता है, कय (Vomit) पीली होती है। 
  • डॉ. क्लार्क का कहना है कि जिन व्यक्तियों पर इस औषधि का परीक्षण किया गया उनमें पीली कय विशेष तौर पर पायी गई।
  • सिना तथा चेलीडोनियम में भी पीलापन होता है।

2. जीभ, मुँह तथा गले में आतशक के जख्म; गोल छेद वाले जख्म

  • इस औषधि से जिह्वा, मुँह, तालु तथा गले के जख़्म (Ulcers) ठीक हो जाते हैं, भले ही वह आतशक (Syphilis) के जख्म हों।
  • बाल का अनुभव: जिह्वा के जख्मों के साथ रोगी को जिह्वा की जड़ों में 'बाल' (Hair) पड़े होने का अनुभव होता है। जिह्वा की जड़ में बाल पड़े होने का-सा अनुभव मुँह में भी हो सकता है, नाक में भी।
  • गले के जख्म: मुँह के जख्म के अतिरिक्त गले में, टॉन्सिलों (Tonsils) में जख्म हो जाते हैं। गले के भीतर ये जख़्म इतने फैल जाते हैं कि उनसे तालु (Uvula/Palate) ही खाया-सा जाता है। टॉन्सिल सूज जाते हैं, सख्त लाल हो जाते हैं, उनमें पीप पड़ जाती है। गले तथा टॉन्सिल की सूजन से दर्द कानों तक पहुंचता है।

गोल छेद वाले ज़ख्म (Punched out Ulcers): 

  • भिन्न-भिन्न स्थानों में जो ज़ख्म होते हैं वे गहरे होते हैं, और ऐसा लगता है जैसे बड़ा-सा साफ छेद—पंच (Punch)—कर दिया गया हो। इनके किनारे बड़े साफ-सुथरे होते हैं। 
  • डॉ. नैश ने एक स्त्री के तालु के जख्म को, जो आतशक जैसा लग रहा था, Kali Bichromicum 30 से ठीक कर दिया था। आतशक के जख़्म जो बहुत बढ़ चुके हों, उन्हें भी यह औषधि ठीक कर देती है। 
  • कैलि बाईक्रोम का घाव गहरा और ऐसा साफ होता है मानो किसी ने सफाई से गोल छेद काटा हो,  मर्क्यूरियस का घाव गहरा नहीं होता, फैला हुआ होता है - यह दोनों में भेद है।

3. छोटे-से स्थान में दर्द होना; दर्द का स्थान-परिवर्तन

एक बिंदु पर दर्द (Pain in small spots): 

  • जब शरीर के किसी स्थान पर एक जगह दर्द हो जो अंगूठे के पोर (Tip of thumb) से ढंका जा सके, तब इस औषधि से बहुत लाभ होगा। 
  • सिर-दर्द में भी ऐसा दर्द होता है, एक स्थान-विशेष पर, एक बिन्दु पर—इसी को 'स्वल्प-स्थानपना' (Spottiness) कहा है। ऐसा सिर-दर्द Ignatia में भी पाया जाता है ।
  • यद्यपि दर्द छोटी-सी जगह पर होता है, तो भी असह्य होता है। 
  • केलि बाईक्रोम का इस प्रकार का सिर-दर्द कनपटी के एक तरफ पाया जाता है, परन्तु दर्द में मुख्य-लक्षण एक बिन्दु पर दर्द होना है। दाई छाती पर एक बिन्दु पर दर्द होना, कमर में त्रिकास्थि (Sacrum) में कए पॉयन्ट पर दर्द होना-एक छोटे से स्थान पर दर्द होना इसका विशेष लक्षण है।

स्थान-परिवर्तन (Wandering Pains): 

  • गठिये के रोग में दर्द एक जोड़ से दूसरे जोड़ में चला-फिरा करता है। यह लक्षण Pulsatilla में भी पाया जाता है।
  • एकाएक आना-जाना: यह दर्द एकदम आता है और एकदम चला भी जाता है। (यह लक्षण Belladonna में भी है)।

(चलने-फिरने वाले दर्द में मुख्य-मुख्य औषधियां - Medicines for Wandering Pains):

1. कैलि बाईक्रोम (Kali Bichromicum): इस औषधि में दर्द इतनी देर नहीं ठहरता जितनी देर पल्सेटिला (Pulsatilla) में ठहरता है। कैलि बाई में गठिये (Rheumatism) के दर्द में शोथ (Swelling) भी ज्यादा नहीं होता। गठिये के दर्द में इसके अन्य दवाओं से भिन्न होने का एक लक्षण यह भी है कि इसमें डिसेन्ट्री (Dysentery) तथा गठिया पर्याय-क्रम (Alternating) से आते-जाते हैं; जब डिसेन्ट्री हो जाती है तब गठिया जाता रहता है, और जब गठिया आ जाता है तब डिसेन्ट्री जाती रहती है।

2. कैलि सल्फ (Kali Sulph) और पल्सेटिला (Pulsatilla): ये दोनों दवाएं एक-सी हैं। कैलि बाईक्रोम शीत-प्रधान (Chilly) है; जब रोगी गर्म बिस्तर में लेटता (Lies down) है, तब उसकी तकलीफों में कमी हो जाती है। इसके विपरीत, कैलि सल्फ और पल्सेटिला ऊष्णता-प्रधान (Warm-blooded/Hot) हैं, वे गर्मी से घबराते हैं। दर्द इन दोनों का भी चलता-फिरता (Wandering) रहता है।

3. लैक कैनाइनम (Lac Caninum): इस औषधि में दर्द पासे (Sides) बदलता रहता है; एक दिन दाईं तरफ तो दूसरे दिन बायीं तरफ, फिर दायें, फिर बायें (Erratic shifting pain)।

सिर-दर्द से पहले देख न सकना (Blindness before Headache): जुकाम होने के बाद तेज सिर-दर्द होना शुरू हो जाता है, दर्द माथे पर किसी एक बिन्दु पर टिक जाता है। सिर-दर्द शुरू होने से पहले रोगी देख नहीं सकता (Blurred vision/Blindness), सिर-दर्द शुरू होने के बाद दृष्टि ठीक हो जाती है। (Silicea में सिर-दर्द शुरू होने के बाद आंखों के सामने अन्धेरा आ जाता है)।

4. गठिया और पेचिश या गठिया और पेट रोग में पर्याय-क्रम (Alternation)

  • इसके दर्द के लक्षणों से स्पष्ट हो गया होगा कि गठिये की यह मुख्य औषधि है। जोडों में दर्द होता है, वे सूज जाते हैं, लाल हो जाते हैं, दर्द चलता-फिरता है। 
  • गठिये में  इसका विशेष-लक्षण यह है कि जब पेचिश (Dysentery) होती है तब गठिया हट जाता है; जब गठिया होता है तब पेचिश हट जाती है। पेचिश प्रायः पतझड़ (शरद् के बाद) और गठिया प्रायः बसन्त (ग्रीष्म से पूर्व) में होता है।
  •  इसी तरह गठिये और पेट की बीमारी (Gastric troubles) में भी पर्याय-क्रम (Alternation) रहता है।

5. शियाटिका के दर्द का गर्मी से बढ़ना

  • रोगी शीत-प्रधान (Chilly) है, शरीर की गर्मी की उसमें कमी होती है, कपड़े से लिपटा रहना चाहता है। उसकी हर शिकायत ठंड में बढ़ जाती है। जैसे खाँसी ठंड में बढ़ती है और गर्मी से घटती है।
  • डॉ. केंट लिखते हैं कि शियाटिका (Sciatica) के दर्द में इस औषधि की विशेषता यह है कि रोगी के शीत-प्रधान होते हुए भी उसका शियाटिका का दर्द गर्म ऋतु (Summer) में बढ़ जाता है। 
  • दर्द में हरकत से, टांग को मरोड़ने (Flexing the leg) से और चलने-फिरने से आराम मिलता है, जबकि गर्म सेक से दर्द बढ़ता है। दर्द कूल्हे से या घुटने से पिंडली तक फैलता है।
  • इस औषधि में गठिये का दर्द ग्रीष्म ऋतु में अधिक होता है- यह इसका विशिष्ट लक्षण है।
  • शायटिका के दर्द में काली कार्ब भी उत्तम है।

6. पित्त-पथरी (Gallstone)

  • जिगर की बीमारी में जब पित्त-पथरी (Gallstone) बन जाती है, तब इसके प्रयोग से शुद्ध-पित्त बनने लगता है, और पित्त-पथरी बनने की प्रकृति बदल जाती है। अगर रोगी में पित्त की पथरी बन चुकी होती है तो वह घुल सकती है या निकल सकती है।

7. अन्य लक्षण और प्रकृति

  • शीत-प्रधान और स्थूल-काय: रोगी शीत-प्रधान (Chilly) और शरीर से मोटा (Stout/Fat) होता है।
  • समय: उसका कोई भी रोग प्रातः 2 और 3 बजे के बीच बढ़ जाता है (विशेषकर दमा और खांसी)। 2 और 3 बजे के बीच रोग के बढ़ने को विशेष रूप में ध्यान में रखने की आवश्यकता है क्योंकि इस लक्षण के आधार पर अनेक रोग ठीक हो जाते हैं।
  • अगर कोई रोगी चिकित्सक को कहे कि उसकी खांसी, उसका दर्द, उसका गठिया, उसका दमा 3 बजे प्रातः काल बढ़ जाता है, तो कैलि बाइक्रोम को हर्गिज नहीं भूलना चाहिए।
  • प्रत्येक दिन निश्चित घंटे पर किसी दर्द का होना।
  • अंगुलियों में गठिये का दर्द।
  • पेट: खाने के बाद उसे परेशानी होने लगती है (पेट में भारीपन)। Kali Bichromicum तथा Nux Moschata में खाना खाते ही पेट-दर्द शुरू हो जाता है। (Nux Vomica तथा Anacardium में खाने के 1-2 घंटे बाद होता है)।
  • डायबिटीज (Diabetes): डॉ. जॉर्ज रॉयल (Dr. George Royal) स्वयं डायबिटीज के मरीज थे और एक महीने तक Kali Bichromicum 3x लेने से ठीक हो गए थे। तब से वे इस चिकित्सा में इतनी दिलचस्पी लेने लगे कि स्वयं होम्योपैथ बन गये।
  • बीयर: बीयर (Beer) पीने से तकलीफें बढ़ती हैं (विशेषकर दस्त और गठिया)।

8. शक्ति तथा प्रकृति (Potency and Nature)

  • शक्ति: 3x, 30, 200। (इस औषधि की निम्न-शक्ति की दवा द्रव रूप में देर तक रखने से खराब हो जाती है, इसलिए ताजी बनानी चाहिए या विचूर्ण/Trituration का प्रयोग करना चाहिए)।
  • प्रकृति: औषधि 'सर्द' (Chilly) प्रकृति के लिए है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: Kali Bichromicum का सबसे मुख्य लक्षण क्या है? 

उत्तर: "रेशेदार बलगम" (Stringy Mucus) जो खींचने पर लम्बे तार जैसा निकलता है, और दर्द का एक छोटे से बिंदु (Spot) पर होना।

प्रश्न 2: शियाटिका में यह अन्य दवाओं से कैसे अलग है? 

उत्तर: आम तौर पर शियाटिका ठंड से बढ़ता है, लेकिन Kali Bichromicum का शियाटिका "गर्मी" (Heat) से बढ़ता है और "चलने-फिरने" (Motion) से कम होता है।

प्रश्न 3: क्या यह साइनस (Sinusitis) में काम आती है? 

उत्तर: जी हां, यदि नाक की जड़ में दर्द हो, गाढ़ा-पीला बलगम जमता हो और पपड़ियां (Crusts) निकलती हों, तो यह साइनस की सर्वोत्तम दवा है।

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